This blog has my Hindi poems, articles and stories, mainly based on my migrant experiences in Australia. इस ब्लॉग में मेरी साहित्यिक रचनाएं हैं, आशा है सुधी पाठक पढ़ कर विचार व्यक्त करेंगे।
Sunday, August 15, 2021
बहुत छोटी बहर की ग़ज़ल - रेखा राजवंशी
पास आओ तो ज़रा
मुस्कुराओ तो ज़रा
-रात भी गाने लगे
गुनगुनाओ तो ज़रा
-शाम है तन्हा बहुत
साथ आओ तो ज़रा
-कौन जीता है सदा
ये बताओ तो ज़रा
-यूँ न रूठो हमसे तुम
मान जाओ तो ज़रा
-है मुहब्बत गर तुम्हें
तो जताओ तो ज़रा
-रेखा राजवंशी
Monday, March 1, 2021
Monday, September 21, 2020
Tuesday, September 1, 2020
बासंती धूप
खिली नई बासंती धूप
मौसम ने बदला है रूप
-
जाड़े ने धीरे से बंद किए दरवाज़े ...
फूलों के नए रंग हर क्यारी में साजे
सबको भाया ये स्वरूप
खिली नई बासंती धूप
-
मन हुआ तरंगित जब, गूंजा बसंत राग
नव पल्लव, नव सौरभ, बिखरा गंधित पराग
रिक्त हुए अंधियारे कूप
खिली नई बासंती धूप
-
पंछी चहके चहके, बगिया महके महके
फिर प्रेमी युगलों के, मन हैं बहके बहके
बिखराए सूरज ने लूप*
खिली नई बासंती धूप
- रेखा
लूप= coronal loops in the sun’s atmosphere
Sunday, August 16, 2020
स्वतंत्रता दिवस पर मुक्तक - रेखा राजवंशी
1.
सीमा पे एक सिपाही जो शहीद हो गया
न जाने कितने खार सबके दिल में बो गया
कि जैसे कायनात ही सारी ठहर गई
कोई सितारा आसमाँ से आज खो गया

2.
इस तिरंगे पर सभी को नाज़ हो
और तरक्की का नया अंदाज़ हो
कामयाबी देश के चूमे कदम
अब नए आयाम का आगाज़ हो
Friday, July 17, 2020
Sunday, June 14, 2020
Saturday, June 6, 2020
नवगीत
पतझड़
पतझड़
रेखा राजवंशी
आज हवा ने फिर पतझड़ पर
लिक्खे गीत नए
पत्ते ताली बजा बजा कर
ढूंढें मीत नए
बौराए बादल ने भी रच डाला अपना राग
सूर्यदेव ने धीमी कर दी वहां गैस की आग
शाम आज कुछ जल्दी आई
रस्ते रीत गए
आज हवा ने फिर पतझड़ पर
लिक्खे गीत नए
चंदा ने अपने दरवाज़े बंद कर लिए कैसे
जला अंगीठी बैठे तारे हाथ सेंकते जैसे
रात बहुत सन्नाटा लाई
जुगनू जीत गए
आज हवा ने फिर पतझड़ पर
लिक्खे गीत नए
वार्डरोब से याद तुम्हारी चुपके चुपके आई
कैडबरीज सी मीठी जाने कितनी यादें लाई
सोचे मन कि बिना तुम्हारे
बरसों बीत गए
आज हवा ने फिर पतझड़ पर
लिक्खे गीत नए
कैडबरीज सी मीठी जाने कितनी यादें लाई
सोचे मन कि बिना तुम्हारे
बरसों बीत गए
आज हवा ने फिर पतझड़ पर
लिक्खे गीत नए
Tuesday, April 7, 2020
Friday, April 3, 2020
Sunday, February 16, 2020
Saturday, February 15, 2020
Thursday, January 2, 2020
नवगीत-नए साल ने जैसे ही कुंडी खड़काई
बाज़ारों में सजी दुकानें,
बार क्लबों में रौनक छाई
नए साल ने जैसे ही कुंडी खड़काई
.
शॉपिंग मॉल सजे दुल्हन से
ख़ुशी छलकती तन से, मन से
लूट मची है दुकानों में
भरें तिजोरी सारे, धन से
बार बी क्यू की खुशबू फैली
सबके मन को भाई
नए साल ने जैसे ही कुंडी खड़काई
.
कुछ ड्रग खा ग़म भूल रहे हैं
सपन लोक में झूल रहे हैं
कुछ ‘गे’ जोड़े ‘किस’ करने में
कोने में मशगूल रहे हैं
लिये हाथ में बियर की बोतल
खड़े हुए सौदाई
नए साल ने जैसे ही कुंडी खड़काई
......................................
रेखा राजवंशी
सिडनी, ऑस्ट्रेलिया
बार क्लबों में रौनक छाई
नए साल ने जैसे ही कुंडी खड़काई
.
शॉपिंग मॉल सजे दुल्हन से
ख़ुशी छलकती तन से, मन से
लूट मची है दुकानों में
भरें तिजोरी सारे, धन से
बार बी क्यू की खुशबू फैली
सबके मन को भाई
नए साल ने जैसे ही कुंडी खड़काई
कुछ पीकर के मस्त हो गए
बार गली में व्यस्त हो गए
नाइट क्लबों में डांस कर रहे
जोड़े थक कर ध्वस्त हो गए
सजी-धजी संध्या बाला ने
जैसी ली अंगड़ाई
नए साल ने जैसे ही कुंडी खड़काई
बार गली में व्यस्त हो गए
नाइट क्लबों में डांस कर रहे
जोड़े थक कर ध्वस्त हो गए
सजी-धजी संध्या बाला ने
जैसी ली अंगड़ाई
नए साल ने जैसे ही कुंडी खड़काई
.कुछ ड्रग खा ग़म भूल रहे हैं
सपन लोक में झूल रहे हैं
कुछ ‘गे’ जोड़े ‘किस’ करने में
कोने में मशगूल रहे हैं
लिये हाथ में बियर की बोतल
खड़े हुए सौदाई
नए साल ने जैसे ही कुंडी खड़काई
.
पिकिनक सारे लोग मनाते
फायर वर्क्स देखने आते
नए साल का स्वागत करने
हार्बर ब्रिज भरपूर सजाते
सिडनी वासी उमड़ पड़े ले
खाना और चटाई
नए साल ने जैसे ही कुंडी खड़काईफायर वर्क्स देखने आते
नए साल का स्वागत करने
हार्बर ब्रिज भरपूर सजाते
सिडनी वासी उमड़ पड़े ले
खाना और चटाई
......................................
रेखा राजवंशी
सिडनी, ऑस्ट्रेलिया
Tuesday, January 15, 2019
गांधी
गांधी सिर्फ नाम नहीं
सिर्फ शख्सियत नहीं
सिर्फ विचार नहीं
गांधी आचरण है
दैनिक व्यवहार है
जीवन का आधार है
गांधी की मूर्ति
गाँधी के चित्र
गांधी के सिद्धांत
सिर्फ माल्यार्पण के लिए नहीं
सिर्फ राजनीति के लिए नहीं
सिर्फ सरकारी दफ्तरों में
लटकने के लिए नहीं
गाँधी के चित्र
गांधी के सिद्धांत
सिर्फ माल्यार्पण के लिए नहीं
सिर्फ राजनीति के लिए नहीं
सिर्फ सरकारी दफ्तरों में
लटकने के लिए नहीं
दो अक्टूबर को हर साल
राजनेताओं का हो जाता है
राजघाट पर जमावड़ा
आउटडेटेड चरखा
स्टोर से निकलता है
और रघुपति राघव राजा राम
का संगीत बजता है
श्रद्धा सुमन अर्पण के साथ
राजनेताओं का हो जाता है
राजघाट पर जमावड़ा
आउटडेटेड चरखा
स्टोर से निकलता है
और रघुपति राघव राजा राम
का संगीत बजता है
श्रद्धा सुमन अर्पण के साथ
आधी धोती में खड़े बापू
कन्फ्यूज्ड नज़रों से देखते हैं
संसद में सूटेड-बूटेड नेताओं को
प्रधानमंत्री को, मंत्रियों को
फाइव स्टार होटलनुमा घरों में
भारत का भाग्य रचते व्यापारियों को
मल्टी नेशनल कंपनियों को
कन्फ्यूज्ड नज़रों से देखते हैं
संसद में सूटेड-बूटेड नेताओं को
प्रधानमंत्री को, मंत्रियों को
फाइव स्टार होटलनुमा घरों में
भारत का भाग्य रचते व्यापारियों को
मल्टी नेशनल कंपनियों को
और दूसरी तरफ
आत्मदाह करते किसानों को
सीमा पर लड़ते जवानो को
डिस्को में थिरकते युवाओं को
अपमानित होती महिलाओं को
भ्रमित बापू, शंकित बापू
व्यथित बापू, लौट जाते हैं
और गांधी की मूर्ति, गांधी का चित्र
गांधी के सिद्धांत, लटके रहते हैं
सरकारी दफ्तरों में
राजनेताओं के घरों में
और राष्ट्रपति भवन में !
व्यथित बापू, लौट जाते हैं
और गांधी की मूर्ति, गांधी का चित्र
गांधी के सिद्धांत, लटके रहते हैं
सरकारी दफ्तरों में
राजनेताओं के घरों में
और राष्ट्रपति भवन में !
Sunday, March 4, 2018
Wednesday, November 29, 2017
बहादुर माँ – कहानी, रेखा राजवंशी
ध्रुव जब घर पहुंचा तो घर में तो चुप्पी थी, भारी क़दमों से वो सोफे तक पहुंचा और उसमें धंस गया। सारा शरीर जैसे सुन्न सा होता जा रहा था, पैरों की शक्ति कम होती लग रही थी। ध्रुव के अशांत मन में द्वन्द चल रहा था। माँ को पता लगेगा तो क्या होगा, सोच-सोच कर वह घबरा रहा था। कैसे आखिर वो यह सहन कर पाएगी।
ध्रुव सोचने लगा- घर में और कौन है उसका मेरे अलावा, बड़ी आशाएं हैं उसे मुझसे, अब सब मिट्टी में मिल जाएँगी। मुझसे ऐसा क्यों हो गया, क्या सचमुच मेरी गलती थी, उसे लगा कि उसकी सोचने, समझने की शक्ति समाप्त हो गई है। अब तो जो होना है होगा, भरे मन से वो फ्रिज तक गया और बोतल से एक गिलास पानी लिया, पैनाडोल निकालने के लिए कैबिनेट खोली, तो मन किया सारी दवाइयां एक साथ फांक ले तो न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। पर फिर माँ की शक्ल सामने आ गई, क्या होगा उसका मेरे बाद। बड़ी हसरत से मुझे पढ़ाया लिखाया है, अब अच्छी नौकरी मिली है और सब कुछ सही तरह से चल रहा था कि अचानक ये क्या हो गया। दो पैनाडोल पानी के साथ फांक ही रहा था कि बाहर पुलिस का साइरन सुनाई दिया, उसे लगा कि बस अब घर की घंटी बजने ही वाली है। जल्दी ही पुलिस उसे अरेस्ट कर लेगी। शाम के पांच बजे हैं, माँ छः बजे तक काम से लौटेगी, उसे कौन बताएगा, उसके ऊपर तो दुःख का पहाड़ ही टूट पड़ेगा।
पिता की बचपन में ही मृत्यु हो गई थी, मामा से माँ का दुःख देखा नहीं गया और हमें ऑस्ट्रेलिया बुला लिया। सरकारी विद्यालय में मेरा दाखिला करा दिया और माँ को मशरूम की फैक्टरी में काम मिला। मामा के बच्चे नहीं थे, तो मामा ने खूब प्यार दिया। शीघ्र ही माँ को पोस्ट ऑफिस में नौकरी मिल गई और हम एक किराए के फ्लैट में रहने लगे। ज़िंदगी बड़ी अच्छी थी, माँ और मैं साथ-साथ बाज़ार जाते, बाहर ही कुछ खा लेते। माँ का ध्यान हर वक्त मेरी पढ़ाई में रहता, उसका सपना था कि मैं डाक्टर बनू। मैंने उसकी इच्छा पूरी की अब मैं उनतीस साल का हूँ, और मेडिकल सेंटर में जी पी हूँ। माँ मेरी शादी के ख़्वाब सजा रही है और मैं हूँ कि उसे इतना बड़ा धक्का देने जा रहा हूँ।
दरवाज़े की घंटी नहीं बजी, पुलिस कार साइरन बजाती दूर चली गई।
मैंने घर पर दृष्टि डाली, ये फ्लैट माँ के अथक परिश्रम का फल था, जिसे उसने दस साल पहले खरीदा था। मैंने उससे वादा किया था कि इसका बचा हुआ उधार मैं चुकाऊंगा। पर अब तो जेल की काल कोठरी में बीस साल गुज़ारने पड़ेंगे। मेरी आँखों से आसुओं की धार बह निकली। गलती मेरी थी ही कहाँ? लाल बत्ती पर मैं खड़ा हुआ था, जब हरी बत्ती हुई तो गाड़ी चला दी, पर जाने कैसे वो आदमी बीच सड़क पर आ गया, शायद भाग कर सड़क पार करने के लिए और मेरी गाड़ी उससे टकरा गई, वो उछल कर दूर गिरा, मैंने गाड़ी किनारे रोकी, ट्रैफिक जाम हो गया, एम्बूलैंस आई, पुलिस आई, जांच-पड़ताल चल ही रही थी कि मैं धीरे से निकल लिया। मुझे पता है कि पुलिस जल्दी ही मुझे पकड़ लेगी, तो माँ के नाम एक चिठ्ठी लिखनी ज़रूरी थी, फिर मैं खुद को पुलिस के हवाले ही कर दूंगा।
सोच ही रहा था कि दरवाज़े की घंटी बजी, दिल धड़क उठा, पुलिस आ गई। अब माँ को कैसे बताउंगा? आगे बढ़ कर दरवाज़ा खोला-
‘व्हाट ए सरप्राइज़! आज तो मैं जल्दी आने वाली थी, और तुम मुझसे पहले ही आ गए’ माँ ने माथा चूमा, उसकी नज़र मुझ पर पड़ी, चेहरे का रंग देखते ही समझ गई कि कहीं कुछ गड़बड़ है।
उसने पूछा ‘क्या हुआ?’
मैं उसके सीने से लग गया एक छोटे बच्चे की तरह रोने लगा -’माँ मुझे माफ़ कर दो, मैंने जानकर कुछ नहीं किया, अचानक ऐसा हो गया।’
माँ ने हिम्मत से सब सुना, वो कुछ समझ नहीं पाई, जब समझी तो कहने लगी ‘कौन जानता है कि कब क्या होने वाला है, ये भी भाग्य का फेर है, चलो कुछ खा लो, फिर पुलिस थाने चलते हैं। गलती तुम्हारी नहीं थी, पर अच्छा यही है कि अपना अपराध स्वीकार कर लिया जाए।'
मैंने माँ की ओर देखा और पहली बार महसूस किया कि माँ सचमुच कितनी बहादुर है।
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