This blog has my Hindi poems, articles and stories, mainly based on my migrant experiences in Australia. इस ब्लॉग में मेरी साहित्यिक रचनाएं हैं, आशा है सुधी पाठक पढ़ कर विचार व्यक्त करेंगे।
Saturday, November 9, 2013
Thursday, August 15, 2013
झंडे में लिपटी, अनगिन यादें
भारत के झंडे में लिपटी, अनगिन यादें आईं हैं
माँ की ममता, लाड़ पिता का, जाने क्या-२ लाई हैं ।
इसमें बंद शहीदों के बलिदानों
की गौरव गाथा
आज़ादी की मीठी खुशबू, नई रवानी
लाई है ।
बीता बचपन इसमें है, भूले
बिसरे अफसाने हैं
चरखा, मित्र, पतंगें, टीचर, बंटती हुई मिठाई है ।
कुछ जोशीले नारे भी हैं, कुछ
बेबाक तराने हैं
गांधी, सुभाष और भगतसिंह की,
क़ुरबानी रंग लाई है ।
खट्टी अमिया का अचार और पूरी-आलू
की सुगंध है
आज़ादी की स्वर्णिम बेला सबके
मन को भाई है ।
रेखा राजवंशी,
सिडनी, ऑस्ट्रेलिया
Friday, July 5, 2013
बच्चों के नाम तीन कविताएं
1.
कम्प्यूटर
नहीं चाहिए मुझको ट्यूटर
माँ मुझको ला दे कम्प्यूटर।
कम्प्यूटर में ज्ञान है सारा
ये है सारे जग से न्यारा।
ये स्पेलिंग सिखलाता है
शब्दकोष इसमें आता है।
पूछो कोई भी सवाल तो
गूगल भाई सुलझाता है।
गणित और विज्ञान सभी के
मिनटों में ले आता उत्तर।
नहीं चाहिए मुझको ट्यूटर
माँ मुझको ला दे कम्प्यूटर।
.....
2.
आइसक्रीम वाला
आइसक्रीम वाला आया
देखो आइसक्रीम लाया
मैंगो, कुल्फी और वनिला
खाएं मुन्नी और शकीला
...
3.
पापा लाए पॉपकॉर्न
माँ ने बनाए पॉपकॉर्न
माइक्रोवेव में जब रखे
उछले कूदे पॉपकॉर्न
जब थोडा सा शांत हुए
निकले फूले पॉपकॉर्न
माँ, पापा, दीदी, भैया
सबने खाए पॉपकॉर्न
हलके-फुल्के, रुल्के-ढुलके
मन को भाए पॉपकॉर्न
.....
रेखा राजवंशीसिडनी, ऑस्ट्रेलिया
Tuesday, April 23, 2013
बहता नीर
साफ़ अपना ज़मीर कर लीजे
..
ठहरे पानी से मलिन मत रहिये
सोच को बहता नीर कर लीजे
..
कल गया, आज, अभी ये है सच
ये सच्चाई लकीर कर लीजे
..
माफ़ कर दें और मांग लें माफ़ी
दूर यूँ मन की पीर कर लीजे
..
न घुटन और न गर्मी बनिए
बन के शीतल समीर बह लीजे
..
मौत जीवन की चल रही चक्की
भाव अपना गंभीर कर लीजे
..
रेखा राजवंशी, सिडनी
Wednesday, March 20, 2013
वर्ना ........
1. आईने सच नहीं कहते वर्ना
देख के अक्स लोग डर जाते
...
2. अपना घर तो है, चाहें जैसा है
वर्ना हर शाम को किधर जाते
..
3. हवाएं गर्म हैं, मगर
हैं तो
वर्ना तो लोग घुट के मर जाते
..
4. कस्बों में अपने नौकरी ही नहीं
वर्ना क्यों लोग यूँ शहर जाते
..
5. उनके दिल में ही मुहब्बत न थी
वर्ना दो पल को तो ठहर जाते
..
6. एक सहरा में खो गए वर्ना
लोग कहते हैं वो सहर लाते
..
7. डर है दिल में ज़माने का वर्ना
हम तुम इन्कलाब कर जाते
..
-रेखा राजवंशी
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