Thursday, October 2, 2014

मेरी नई ग़ज़ल


लोग बातें बनाने लगे हैं, 
सबको नीचा दिखाने लगे हैं

कल हुए थे जो पैदा वो पौधे, 

खुद को बरगद बताने लगे हैं

कांच के घर में जो रह रहे हैं, 

देखो पत्थर उठाने लगे हैं

जेब में चार पैसे जो आए, 

आँख सबको दिखाने लगे हैं

पहले ऊँगली पकड़ चल रहे थे, 

आज दुनिया चलाने लगे हैं

नाम का दोस्त ऐसा नशा हैं, 
अपनों को ही भुलाने लगे हैं

बन के जुगनू चमकते थे अब तक, 

खुद को सूरज बताने लगे हैं

जिसको सीढ़ी बनाकर चढ़े थे, 

अब उसी को गिराने लगे हैं

रूठकर जा रहे हैं वो जिनको, 

लौटने में ज़माने लगे हैं


….
रेखा राजवंशी 

Monday, September 22, 2014

कलियुग की भगीरथ


गंगा उछलती है, मचलती है,
अपार विस्तार में, नर्तन करती है,
लोगों की आस्था को बढ़ाती है,
और जीवन रस बांटती बहती जाती है

जीवन की लालिमा हो
तो शक्ति का संचार करती है,
मृत्यु की कालिमा में
मुक्ति का द्वार खोलती है

बरसों से बहते-२ थकी नहीं, 
अपनी संपत्ति देते-देते छकी नहीं,
अपना जल बांटते-बांटते सूखी नहीं
लोगों की गन्दगी ढोते-ढोते रुकी नहीं

अपनी आँख की कोरों पर
टपकते आंसुओं को पी लेती है,
गंगा शिकायत नहीं करती,
बस यूँ ही जी लेती है
 
अब कुछ उदास है
पर बहती जाती है,
माँ है न… सब सह कर भी
मुस्कुराती है

देश छोड़ रही थी, तो समेट लाई थी 
गंगा मेरे सूटकेस में खिलखिलाई थी
अब गंगा मेरे घर में रहती है
पूजा त्योहारों में, पावन वो बहती है


माँ की तरह, मेरे सारे सुख-दुःख सहती है,
जाने कितने अफ़साने, गुप-चुप मुझसे कहती है,
कि फल देने लगते है, मेरे सारे तीरथ
कि मैं बनने लगती हूँ, कलियुग की भगीरथ

रेखा राजवंशी
सिडनी, ऑस्ट्रेलिया



Saturday, August 23, 2014

"मुक्तक" रेखा राजवंशी की डायरी


अपनी किस्मत को कुछ ऐसे भी संवारा जाए
बीते लम्हात को फिर आज  पुकारा जाए 
कोई शिकवा, न शिकायत, न गिला आज करें  
चंद साँसों का सफ़र साथ गुज़ारा जाए  
…..


कौन कहता है कि तुम चांदनी की बात करो
न ये ख्वाहिश है कि सहराओं में बरसात करो
इल्तिज़ा इतनी है गुमसुम न रहो, चुप न रहो
जब भी मिलते हो सनम, हंस के मुलाक़ात करो

….

इन अँधेरों को चलो आज हटाया जाए,  
रौशनी के लिए एक दीप जलाया जाए,
प्यार की शम्मा हो और तेल भरोसे का हो,
रूठते दोस्त को इस तरह मनाया जाए

…..

                                                      
                                                     
मौत जीवन के बीच में फंसा झमेला है
रिश्तों नातों से बंधा है, ये एक मेला है 
ज़िन्दगी में तो बहुत लोग मिला करते हैं
सच मगर ये है यहाँ आदमी अकेला है।





रेखा राजवंशी
22/8/2014

Monday, July 28, 2014

ईद की रात












शाम चुपचप ढलती जाती  है
तुम्हारी बात चलती जाती  है  

आँख को न था हादसों पे यकीं
न वो हंसती, न रोने पाती  है

देख के चंद सितारों का रुख
कश्ती तूफ़ाँ में बढ़ती जाती है

लेके हाथों में वो सूखे गज़रे
ज़िंदगी ग़ज़ल गुनगुनाती है  

तुमसे मिलने का, बिछड़ने का सबब,
 दुनिया पूछे तो मुस्कुराती है

वो जो आएं, तो मेरा चाँद आए,
 ईद आती है, चली जाती है  

रेखा राजवंशी

Monday, June 23, 2014

फूल की रंगीन महक











सर्द रातों में सदा दे रहा है कौन मुझे
दिल परेशाँ है और नींद नहीं आती है।

अजीब ढंग है मुझको खबर नहीं अपनी
ज़िंदगी कौन सी मंज़िल पे लिए जाती है।

इक तमन्ना है जो हंसके नहीं जीने देती
क्यों नया दर्द बिना बात दिए जाती है

वो किताबों में दबी फूल की रंगीन महक
आज फिर क्यों मुझे मदहोश किये जाती है 

न संवरती, न बिगड़ती हैं, बदलती भी नहीं
कैसी तन्हाई है, जो मुझ पे मुस्कुराती है 
….

Sunday, February 16, 2014

पेड़ पर तुम्हारा नाम-रेखा राजवंशी



 आज गलती से
उसी पेड़ के पास आ गई हूँ
अपनी कलम से खुरच कर
जिस पर तुमने
लिख डाले थे दो नाम
बड़ी बेताबी से ढूंढती हूँ
मेरा नाम तो दिखता है
उसी तने पर थोड़ा ऊपर
पर तुम्हारा, 
ठीक तुम्हारी तरह                                                                                                      
हो चला है गुमनाम                                                                                                      
मैं ढूंढने लगती हूँ एक नई कलम। 
                                                                                                        ............


पूरी रात ओस गिरती रही
और मैं सोचती रही
कि कुछ हो रहा है 
देखा तो चाँद रो रहा है 
….......

प्रेम की 
सियाही में 
कलम डुबो कर 
कुछ हर्फ़ 
हवा में लिखे 
और उड़ा दिए 

मेरे खत  
तुम तक तो 
पहुंचे होंगे
और तुम्हें
लगा होगा
कि किसी ने 
कहीं दूर 
तुम्हे याद किया है।
....


अब सन्नाटे कुछ कहते नहीं
मेरे साथ चलते हैं परछाई बनकर
बिखरने लगता हैं मन
और मैं नापने लगती हूँ अपना बौनापन।
.....

दिन भर हवा चलती रही
धूल और पत्ते उड़ते रहे
'मैं' फिर से हो गई गुम 
जैसे मेरे ख्यालों के बवंडर में तुम ! 
.....



सर्दी में फायर प्लेस की चिमनी से
लकड़ियों के धुंए की महक आती है 
मुझे अतीत में कहीं दूर ले जाती है
लगता है कि माँ ने अंगीठी जला दी है। 
....