Thursday, August 15, 2013

झंडे में लिपटी, अनगिन यादें





भारत के झंडे में लिपटी, अनगिन यादें आईं हैं
माँ की ममता, लाड़ पिता का, जाने क्या-२ लाई हैं   

इसमें बंद शहीदों के बलिदानों की गौरव गाथा
आज़ादी की मीठी खुशबू, नई रवानी लाई  है

बीता बचपन इसमें है, भूले बिसरे अफसाने हैं 
चरखा, मित्र, पतंगें, टीचर,  बंटती हुई मिठाई है  

कुछ जोशीले नारे भी हैं, कुछ बेबाक तराने हैं
गांधी, सुभाष और भगतसिंह की, क़ुरबानी रंग लाई है

खट्टी अमिया का अचार और पूरी-आलू की सुगंध है
आज़ादी की स्वर्णिम बेला सबके मन को भाई है  

रेखा राजवंशी, 
सिडनी, ऑस्ट्रेलिया  

Friday, July 5, 2013

बच्चों के नाम तीन कविताएं

1.

कम्प्यूटर

नहीं चाहिए मुझको ट्यूटर 
माँ मुझको ला दे कम्प्यूटर। 

कम्प्यूटर में ज्ञान है सारा 
ये है सारे जग से न्यारा। 
ये स्पेलिंग सिखलाता है 
शब्दकोष इसमें आता है।   
पूछो कोई भी सवाल तो 
गूगल भाई सुलझाता है। 
गणित और विज्ञान सभी के 
मिनटों में ले आता उत्तर। 

नहीं चाहिए मुझको ट्यूटर 
माँ मुझको ला दे कम्प्यूटर।

.....

2. 


 आइसक्रीम वाला




आइसक्रीम वाला आया 
देखो आइसक्रीम लाया
मैंगो, कुल्फी और वनिला 
खाएं मुन्नी और शकीला 

...

3. 
पॉपकॉर्न 


पापा लाए पॉपकॉर्न 
माँ ने बनाए पॉपकॉर्न 
माइक्रोवेव में जब रखे 
उछले कूदे पॉपकॉर्न 
जब थोडा सा शांत हुए 
निकले फूले पॉपकॉर्न 
माँ, पापा, दीदी, भैया 
सबने खाए पॉपकॉर्न
हलके-फुल्के, रुल्के-ढुलके  
मन को भाए पॉपकॉर्न 
.....
रेखा राजवंशी
सिडनी,  ऑस्ट्रेलिया 

Tuesday, April 23, 2013

बहता नीर


मन को अपने फ़क़ीर कर लीजे 
साफ़ अपना ज़मीर कर लीजे 
..
ठहरे पानी से मलिन मत रहिये 
सोच को बहता नीर कर लीजे 

..
कल गया, आज, अभी ये है सच 
ये सच्चाई लकीर कर लीजे 
..
माफ़ कर दें और मांग लें माफ़ी 
दूर यूँ मन की पीर कर लीजे
..
न घुटन और न गर्मी बनिए 
बन के शीतल समीर बह लीजे 
..
मौत जीवन की चल रही चक्की 
भाव अपना गंभीर कर लीजे 
..
रेखा राजवंशी, सिडनी 

Wednesday, March 20, 2013

वर्ना ........


1.  आईने सच नहीं कहते वर्ना 
देख के अक्स लोग डर जाते 
...
2. अपना घर तो है, चाहें जैसा है 
वर्ना हर शाम को किधर जाते 
..
 3. हवाएं गर्म हैं, मगर हैं तो 
वर्ना तो लोग घुट के मर जाते 
..
4. कस्बों में अपने नौकरी ही नहीं  
वर्ना क्यों लोग यूँ शहर जाते 
..
5. उनके दिल में ही मुहब्बत न थी  
 वर्ना दो पल को तो  ठहर जाते 
..
6. एक सहरा में खो गए वर्ना 
लोग कहते हैं वो सहर लाते 
..
7. डर है दिल में ज़माने का वर्ना 
हम तुम इन्कलाब कर जाते 
..
-रेखा राजवंशी 

Monday, January 21, 2013

मेरे पहले काव्य संगृह 'अनुभूति के गुलमोहर' से दो कविताएं


1.

गुलमोहर 

ये लाल गुलमोहर 
मुझे याद दिलाता है 
वो लाल रंग 
जो अचानक 
तुम्हारी आँखों में समा गया था 
अंतिम मुलाकात बन 
जाने क्यों हर ओर 
गम ही गम छा गया था 
.
और मैं देखती रही 
आकाश में पैदा होते 
और विलीन हो जाते इन्द्रधनुष को। 
.
कि मैं नहीं चाहती 
इन्द्रधनुष के रंगों को तकना 
बिखरे तिनकों को चुनना 
और तुम्हारी आवाज़ को सुनना 
..
कि मेरा अस्तित्व मेरा अपना है 
कि जला डालती है मुझे 
गुलमोहर के लाल रंग से
बरसती आग 
कि मुझे प्रतीक्षा है 
गुलमोहर मुरझाने की 
और कुछ न पाकर फिर 
'कुछ' तो पा जाने की 
.
-रेखा राजवंशी 

किरच 

चटके शीशे की किरच की तरह 
न जाने कहाँ का ग़म 
दिल में आकर चुभ गया है 
महसूस तो करती हूँ बेपनाह दर्द 
और उसे निकाल फेंकने के लिए 
लगा देती हूँ शक्ति!
परन्तु किरच 'किरच' है 
छोटी बारीक़ और पारदर्शी 
बहते हुए रक्त में रंगी हुई लाल 
जो निकालने के प्रयास में 
 अन्दर की ओर समाती जा रही है 

कि जैसे यह दर्द, यह टीस  
तुम्हारी यादों के 
फूलों के गुच्छे की महक सी 
मेरे अस्तित्व से जुड़ गई है 
और जाने कब ये किरच 
मेरे समूचे अस्तित्व का 
एक हिस्सा बन गई है। 
.
-रेखा राजवंशी 1995