Saturday, October 3, 2015

मेरी नई ग़ज़ल



हमने भी रौशनी से क्या रिश्ते बना लिए
लोगों ने अपने हाथ में पत्थर उठा लिए


मैखाने तलक पहुंचे, लब के करीब लाए
साकी ने सामने से प्याले हटा लिए


यादें मेरे बचपन की, जिसमें बसी हुईं थीं
उस घर में अजनबी ने, ठिकाने बना लिए


न कोई नया नगमा, न ही कोई अफ़साना
जज़्बात सारे अपने, दिल में छिपा लिए


किसको भला दिखाएँ, गमगीन ज़िंदगानी
अपनों ने मेरे बनते, मुकद्दर उठा लिए



          - रेखा राजवंशी

Sunday, May 10, 2015

कि माँ की याद फिर आई

कि माँ की याद फिर आई 
कि फिर चहका है मन आँगन 
कि मन की शुष्क मिट्टी में 
बरस उट्ठा कोई सावन 
कि फिर से मोगरे महके
कि लौट आया मेरा बचपन!


दीवाली की वो फुलझड़ियाँ
या तेरे हाथ की गुझियाँ

वो करवाचौथ की थाली
अहोई गुलगुलों वाली
न जाने कितने अफ़साने
सुनाने लग गया ये मन

कि मेरे फर्स्ट आने की
फ़िकर में रात भर जगना
नज़र बट्टू लगा कर
नौकरी की प्रार्थना करना 
दुआओं में बरसता है 
अभी तक प्यार का चन्दन!

फिर मेरा ब्याह कर देना
पराए घर विदा करना
कि मेरी खैरियत हर वक्त
चिट्ठी से पता करना
न अपना दुःख बताना
झेलना हर बात पत्थर बन!

मेरा परदेस में रहना
तेरा चुप रह के सब सहना 
कि फिर इक दिन खबर आना
मेरा कुछ भी न कर पाना 
कि तेरा यूँ चले जाना

झटक कर प्यार के बंधन!

कि माँ की याद फिर आई 

महक उट्ठा है मन आँगन!


Wednesday, April 15, 2015

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी इतनी भी आसान नहीं, 
कौन है जो कि परेशान नहीं

जिसके दामन में हों खुशियाँ-खुशियाँ, 
ऐसा मिलता कोई इंसान नहीं 

लेके दिल में जो सकूँ रहते हैं, 
उनको भी बख्शते तूफ़ान नहीं  

बन के सूरज जो खिला करते हैं, 
रात के साए से अनजान नहीं 

ग़म की स्याही उड़ेलते हैं जो, 
साफ़ उनके भी गिरेबान नहीं 

किससे अब उनकी शिकायत करिये, 
दोस्त अपने हैं, वो हैवान नहीं 

ज़िन्दगी इतनी भी आसान नहीं, 
कौन है जो कि परेशान नहीं
- रेखा राजवंशी 

Saturday, March 7, 2015

बेटियां- रेखा राजवंशी



 सारे जग की शान बेटियां, घर-घर का सम्मान बेटियां
करुणा, दया निधान बेटियां, ईश्वर की संतान बेटियां
 ..
जब होती हैं नन्हीं बच्ची, तितली जैसी प्यारी अच्छी
ठुमक -२ कर ये चलती हैं, घर भर में रौनक करती हैं
हंसी ख़ुशी की खान बेटियां, हर दुःख से अनजान बेटियां



 राजकुंवर एक दिन आएगा, और ब्याह कर ले जाएगा
 दुनिया नई बसाएंगी वो, बाबुल को तरसाएंगी वो
 दो दिन की मेहमान बेटियां, माँ बाबा की प्राण बेटियां
 ..

बेटी है हर घर का गहना, बेटी को अब पति गृह रहना
सुख-दुःख में है साथ निभाना, मुश्किल लगता माँ घर आना
घर की हैं पहचान बेटियां, आन-बान और शान बेटियां
 ..



घर पर जब विपदा आती है, बेटी दुर्गा बन जाती है
दुर्दिन में लक्ष्मी बन जाती, सरस्वती सी विद्या लाती
वेदों का हैं गान बेटियां, होती बहुत महान बेटियां



माँ का फ़र्ज़ निभाती हैं ये, घर-परिवार चलाती हैं ये
खाना रोज़ खिलाती हैं ये, और कमा के लाती हैं ये
जीवन की मुस्कान बेटियां, दुनिया पर एहसान बेटियां
 ..

बेटी मात्र शरीर नहीं हैं, बस लैला और हीर नहीं है
उस पर अत्याचार न करना, देखो बलात्कार न करना
नहीं कोई सामान बेटियां, अपनी बहन समान बेटियां
....


भ्रूण में कन्या को न मारो, जुए में उसको कभी न हारो
विधवाओं को न धिक्कारो, बस बेटी की नज़र उतारो
पुरखों का वरदान बेटियां, करती हैं बलिदान बेटियां
सारे जग की शान बेटियां, घर-घर का सम्मान बेटियां
..


रेखा राजवंशी-सिडनी ऑस्ट्रेलिया  


Thursday, March 5, 2015

हो री होरी आई



हो री होरी आई हिय हुलस हुलस जाए,
राधे रानी रावरे के रंग रंग राती हैं
..
सर-सर सर से चुनरिया सरक जाए
गोरी गोरे गलों पे गुलाल सकुचाती हैं
..
सांवरे सलोने सुर बांसुरी का तेरा सुन
तन-मन भूल बावरी हुई जाती हैं
..
कोई कहु कहे कान्हा आए, कान्हा आए सखि,
लाज से सिमट झट घुंघटा गिराती हैं
..
भर पिचकारी कान्हा ने जो मारी भीगी सारी,
सारी भीगी राधा, कान्हा मय हुई जाती हैं
..
-रेखा राजवंशी

Thursday, February 19, 2015

लघु कथा -परिंदे

परिंदे- रेखा राजवंशी


वक्त जाने कहाँ उड़ गया, पता ही नहीं चला। 
अब रामकुमार सत्तासी वर्ष के हो गए थे। उन्होंने अखबार में नज़र गड़ाई, आज २१ नवम्बर है, बीस साल पहले जब इकलौता बेटा ऑस्ट्रेलिया आया था, तब वे फूले नहीं समाए थे।  शीघ्र ही उसने रामकुमार जी को बुला लिया। घर में सभी सुख-सुविधाएं थीं। बहू, बच्चो के साथ वक्त अच्छा कट रहा था, बहू उनका ख्याल रखती, काम पर जाती तो खाना बना जाती, फोन करके हाल पूछती रहती।  काम-काज से जितना वक्त मिलता, बेटा उनके साथ बिताता। रामकुमार खुश थे।  

वक्त बीतता गया, पर पिछले दो वर्षों ने पूरा शरीर झिंझोड़ डाला, बीमार रहने लगे।  बच्चों की पढ़ाई, बहू-बेटे की नौकरी, अचानक अकेले से हो गए। बेटे ने कुछ दिन नर्स रखी, फिर डॉक्टर्स के कहने पर उन्हें नर्सिंग होम आना पड़ा। हफ्ते में चार-पांच बार बेटा, बहू, बच्चे आ जाते, फोन पर बात होती रहती।  पर जब रात होती तो भारत के सपने दिखने लगते।  तीन बेटियां भारत में थीं, उनको देखने का मन होता।  मन मज़बूत था लेकिन शरीर में ताकत नहीं थी।  मन परिंदे सा उड़कर जाता और उन्हें प्यार से सहलाकर आ जाता।

इस नर्सिंग होम में सभी व्यक्ति टर्मिनल अवस्था में भर्ती किये जाते हैं। चाहे-अनचाहे शायद सभी मौत की प्रतीक्षा कर रहे थे, उससे ज़्यादा ज़िन्दगी की लड़ाई लड़ रहे थे। कमरे में दो पलंग थे। पास वाले पलंग पर लैरी नाम का एक एबोरीजनल व्यक्ति था। कभी-कभी उससे बतिया लेते, उसकी जिंदादिली उन्हें अच्छी लगती ।     
एक रात रामकुमार किसी के रोने को आवाज़ से उठ गए, लैरी रो रहा था, पहली बार….। डगमगाते पैरों से रामकुमार उठे, उन्होंने लैरी को पानी दिया, टिशू का डिब्बा दिया। लैरी ने उन्हें बताया कि वह 'स्टोलेन जेनेरेशन' का व्यक्ति है, यानि कि उस पीढ़ी का, जिसे अंग्रेज़ उनके माता-पिता से छीन कर ले गए थे।  तब वो सिर्फ दो साल का था।  उसके बाद उसने अपने माता-पिता, भाई-बहिन किसी को नहीं देखा। लैरी एक बार अपने गाँव जाना चाहता था, वो घर जिसमें वो कभी रह नहीं सका, ढूंढना चाहता था। वे लोग जिन्हें वो जानता तक नहीं था, उनसे जुड़ना चाहता था।   कभी वक्त नहीं था, तो कभी पैसे नहीं थे, और अब.…। 

रामकुमार हतप्रभ से देखते रहे, जाने कब लैरी की पीड़ा उनकी पीड़ा बन गई, उसका दर्द उनके मन में उतर आया। उनकी आँखों से आंसुओं की धार बाह निकली। वो आगे बढ़े और लैरी के गले लग गए।
नर्सिंग होम के सन्नाटे में अब दो लोगों के सुबकने की आवाज़ गूँज रही थी ।