Sunday, August 26, 2012

आईने का हर टुकड़ा

आईने का हर टुकड़ा



आईने का हर टुकड़ा, आंसू बहा रहा है
भूला हुआ फ़साना फिर याद आ रहा है

बरसा नहीं था बरसों, बादल भरा हुआ था
बेबाक बारिशों में अपनी नहा रहा है  






तरसे जो चांदनी को, वो लोग भी अजब हैं
अब चाँद मिल गया तो, उनको जला रहा है

 

ताबूत में दबाकर, रख दी थी जो तमन्ना
किसका ख्याल उसमें हलचल मचा रहा रहा है

उसने की आशनाई, उसने की बेवफाई
फिर क्यों मुझे ज़माना कातिल बता रहा है
 


रेखा राजवंशी
सिडनी ऑस्ट्रेलिया

July 2012

Sunday, July 29, 2012

मेरे कुछ नए शेर




1.      ख़्वाब किसके हंसी जले होंगे
अब जो हर ओर धुंआ
उठता
है
........
2.    तुम जो आए तो रौशनी आई
वर्ना
कटती रही अँधेरे में 
...... 
3.    तेरे आने पे अजब आलम है
आँख कहती है जुबाँ चुप सी है
...... 
4    जब भी देखो वो चले आते हैं
    भरते ज़ख्मों को दुखाने के लिए
...... 
5.    इस कदर दर्द ने मजबूर किया
वर्ना हम दर पे तेरे न आते 
...... 
6.    किन गुनाहों की तुम सजा दोगे
हंसने वाले को फिर
 रुला दोगे
...... 
7.    तुम जो आए तो रौशनी आई
वर्ना जीते रहे अँधेरे में
...... 
8.    तेरे गजरे के मोंगरे की महक
रात मुश्किल से कटेगी मेरी
...... 
9.  तेरे हाथों में भरे ख्वाबों ने
कुछ सितारे नए बना डाले
...... 
10.  जुगनू कितने निकल पड़े होंगे
तेरे रस्ते में रौशनी के लिए
...... 
11.  चल चलें दूर कि दुनिया वाले
बात कोई नई बना लेंगे
...... 
        

       रेखा राजवंशी
सिडनी, ऑस्ट्रेलिया
  

सिडनी, ऑस्ट्रेलिया
 

Monday, June 25, 2012


 
दोस्तों,  मेरी ये दो कविताएं उन ख़ास बच्चों के नाम है, जिनके साथ मैं काम करती हूँ, जिन्हें हाइपर एक्टिव और ऑटिस्टिक  कहा जाता है, जो अक्सर विद्यालय की भीड़ में अपने सपनों को लिए गुमनाम हो जाते हैं। 

कैंडी फ्लॉस 



वो छोटी बच्ची
जो कैंडी फ्लॉस  खा रही है
कोई अनसुलझी गुत्थी  सुलझा रही है।

गुलाबी रंग से रंगे हाथों से
तरह तरह की मुद्राएँ बनाती है
कभी कैंडी फ्लॉस  सी ख़ुशी में फूल जाती है
कभी चिपचिपाते चेहरे को पोंछना भूल जाती है
सात साल की ये बच्ची जाने क्या बुदबुदाती है।
उसकी कोई बात तुम्हें समझ नहीं आती है।

तो तुम खीझ जाते हो
और उसे हाइपर एक्टिव  बताते  हो।
लड़की सपनों से खेलती है
रिटलिन की बड़ी खुराक झेलती है
और ढूंढती रहती है
कितने अनकहे सवालों के जवाब
कभी कैंडी में, कभी खिलौनों में और
कभी स्कूल की किताबों में।
..........

Sunday, June 24, 2012


तिनके की तलाश 

एक तिनका हाथ में पकड़े
वो बादलों की ओर ताकता रहा
बादल के पीछे छिपा सूरज
पसीने पोंछता रहा
और छोटा लड़का
जाने क्या खोजता रहा।
विद्यालय की घंटी बजी
वो जैसे सोते से जागा
सर्राटे से क्लास की ओर भागा।
पर तब तक....
तिनका बदल गया था,
टीचर की डांट में।
ज़िन्दगी गुजरने लगी,
यूं ही काट छांट में।
बच्चा अब बड़ा है
शादी की तैयारी है
पर उसकी सूनी आँखों में
तिनके की तलाश
आज भी जारी है।
....
-रेखा राजवंशी

Tuesday, April 3, 2012

रुकी हुई कलम



आज मैं अपने ब्लॉग पर बहुत दिन बाद लिख रही हूँ. करीब -करीब तीन महीने बाद. बहुत बार सोचा पर मन बना नहीं पाई. जैसे उदासी की एक परत मन की ख़ुशी पर आकर जम गई थी. बहुत चाहा कि कुछ लिखूं, पर कलम नहीं चली. ये 'राइटर्स ब्लाक ' नहीं था ये ज़िन्दगी के कटु सत्य से रूबरू होने का परिणाम था.
बड़े भाई बीमार थे, दोनों किडनी फेल हो गईं थीं और दूसरे भाई की देख रेख में इलाज चल रहा था. हर हफ्ते बात हो जाती थी. कभी फोन पर उनकी गिरती हालत का अंदाजा लगता था तो कभी उनकी हालत सुधरने से अच्छा लगता था. जाने कब हम सबकी मनःस्थिति उनकी हालत के उतार-चढ़ाव के साथ बंध गई.  उनकी उम्र ज्यादा नहीं थी सिर्फ बासठ के थे और उम्मीद थी कि कोई किडनी मिलते ही ट्रांसप्लांट हो जाएगा और उनकी ज़िन्दगी कुछ साल और बढ़ जाएगी. किडनी डायलिसिस से भी लोग कई साल जी जाते हैं, यही सोचकर दिलासा मिलता था. पर किस्मत ने साथ नहीं दिया, उनका स्वास्थ्य बिगड़ता गया, और ऑपरेशन के बाद तो सारी आशाएं टूटने लगीं.
हमारी इच्छा थी कि वे कुछ दिन और जी जाते तो अपनी छोटी बेटी की शादी कर पाते. फोन पर बात हुई तो कहने लगे 'आ जाओ, कब आओगी' मैंने कहा जैसे ही छुट्टियाँ होंगी. पर उतना वक्त मिला ही नहीं, जैसे ही छुट्टियाँ हुईं, कुछ सोचने का वक्त मिला, कि खबर आ गई, वे नहीं रहे. मन घबराया और अकेली ही चेन्नई पहुँच गई. एक महीने के प्रवास के बाद जब लौटी तो भी मनःस्थिति ठीक नहीं थी, ज़िन्दगी कांच का एक गिलास लगती थी कि कभी भी गिर जाए और टूट जाए.
तभी होली के वार्षिक चैरिटी रात्रि भोज का आयोजन करने की बात हुई. सामुदायिक अखबार 'द इंडियन डाउन अंडर' की संपादिका नीना बधवार  और मैंने मिलकर पिछले साल कुल सोलह रिक्शों के पैसे इकट्ठे करके दिल्ली भेजे थे, जो श्री राम कॉलेज के साईफ  रिक्शा प्रोजेक्ट में चले गए थे. ऑस्ट्रेलिया के क्वीन्सलैंड राज्य में भीषण बाढ़ से तबाही हुई थी तो हजार डॉलर वहां के लिए भी दिए थे.
इस बार मन उदास था तो न तो हिम्मत थी,  न उत्साह. पर चैरिटी की बात थी तो सोचा प्रयास करा जाए.
करीब हर शाम २ घंटे इन्टरनेट पर सन्देश भेजने या फोन से बात करने में बीतने लगे. कभी लोग अच्छी बात करते तो उत्साह बढ़ता, पर कभी अच्छा उत्तर न मिलता तो निराशा होती. रात्रिभोज के टिकट बेचना सबसे मुश्किल था. राहत फ़तेह अली खां का कॉन्सर्ट था, सोनू निगम के आने का शोर था, ऐसे में चैरिटी जैसी बात में सिडनी के लोग बहुत उत्साहित नहीं लगते थे. चैरिटी का मुख्य प्रयोजन दिल्ली के कालका जी की झुग्गी झोपड़ी में रहने वाली लड़कियों के लिए सिलाई मशीनें इकट्ठी करना और उन्हें सिलाई की ट्रेनिंग देना था.   धीरे- धीरे सिलाई मशीनों को दान करने वालों की संख्या बढ़ने लगी. और हमारा तीस मशीनों का टारगेट पूरा हो गया.
लोगों में उत्साह बढ़ा और रात्रिभोज के दो दिन पहले मशीनों की संख्या चालीस हो गई. मशीनों के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रम की तैयारी करनी थी, पांच दिन की बिहेवियर मैनेजमेंट की नौकरी के साथ एक दिन की सिडनी यूनिवर्सिटी की हिन्दी क्लास,  कुल मिलाकर काम की अधिकता से मैं परेशान हो गई. इस दौरान कुछ लिखा ही नहीं गया. कार्यक्रम सफल रहा, पर रात्रिभोज के अगले दिन कुछ ऐसा हुआ कि मैं लिखने पर मजबूर हो गई.
जब अगले दिन मैं शनिवार की हिन्दी की बारहवीं कक्षा को पढ़ाने गई तो मेरे 15 विद्यार्थियों ने कार्यक्रम के बारे में जानना चाहा, और मैंने उन्हें कार्यक्रम की सफलता की कहानी बताई. क्योंकि रात्रिभोज के दौरान मशीनों की संख्या छप्पन हो गई हम अपने लक्ष्य से दुगनी मशीनें इकट्ठी कर चुके थे. सिडनी के व्यवसाइयों ने ही नहीं, बल्कि व्यक्तियों ने भी उत्साह दिखाया. कार्यक्रम बहुत सफल रहा, तो एक विद्यार्थी ने कहा कि वह मुझे कल शाम फोन करने की कोशिश कर रहा था . वह एक मेहनती छात्र है और सिडनी में अपने भाई के साथ रहता है. अपना खर्चा निकलने के लिए अपने कई हमउम्र लड़कों की तरह पार्ट टाइम नौकरी करता है. गोपनीयता के कारण मैं उसका नाम नहीं लिख सकती आप मान लें कि उस  किशोर का नाम  आकाश है.
कक्षा के बाद मैं कार में बैठी ही थी कि मेरा फोन बजा. मैंने उठाया और कहा कि मैं कार चला रही हूँ,  बात नहीं कर सकती, बाद में फोन करना. घर पहुंची ही थी कि फोन फिर बजा, फोन पर आकाश था. मैंने पूछा 'क्या हुआ, सब ठीक तो है' बोला 'आंटी, बस यही कहना था कि मैं भी एक मशीन देना चाहता हूँ, कल भी मैंने बहुत ट्राई किया आपने फोन नहीं लिया' 
मैं विश्वास न कर सकी. अठ्ठारह साल का लड़का, माँ बाप से दूर, अपने जेब खर्च के लिए नौकरी कर रहा है, जब इस उम्र के किशोर खेलने-खाने की सोचते हैं, वह अपना जेब खर्च काट कर मशीन के लिए एक सौ पच्चीस डॉलर देने की बात कर रहा है. मैं भावुक हो गई-
'अरे तुम आकाश, तुमसे कुछ नहीं चाहिए, मेहनत करके जब कुछ बन जाओगे तो ये सब काम करना, बहुत समय है तुम्हारे पास.'
गर्व और हठ के साथ वो बोला 'मैं कमाता तो हूँ, मैं ज़रूर देना चाहता हूँ, पर प्लीज़ आप मेरा नाम किसी को न बताना, क्लास में तो बिलकुल नहीं.'
और मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सी खड़ी रह गई. आशा की की एक किरण जागी,  उस किरण के सहारे भविष्य के प्रति अचानक  कुछ निश्चिन्त हो गई. मैंने सोचा कि आज पिछले तीन महीनों से रुकी कलम उठा ही लूँ, शायद ये किस्सा आपको भी कहीं  आश्वस्त करे.
....
-       रेखा राजवंशी, सिडनी

Sunday, November 6, 2011

Thursday, November 3, 2011

badlaav


दर्द के पैबंद

मखमली चादर के नीचे दर्द के पैबंद हैं
आपसी रिश्तों के पीछे भी कई अनुबंध हैं।

-दोस्त बन दुश्मन मिले किसका भरोसा कीजिये
मित्र अपनी सांस पर भी अब यहाँ प्रतिबन्ध हैं ।

- तोड़ औरों के घरौंदे घर बसा बैठे हैं लोग
फिर शिकायत कर रहे क्यों टूटते सम्बन्ध हैं।

-दूसरों पर पाँव रखकर चढ़ रहे हैं सीढ़ियां 
और कहते हैं उसूलों के बहुत पाबन्द हैं।

-दिन ज़रा अच्छे हुए तो आसमां छूने लगे
अब गरीबों के लिए घरबार उनके बंद हैं। 

-रेखा राजवंशी