Monday, January 17, 2011

मिनावी Minawee an aboriginal dreamtime story (no 1) ( I translated 13 animation films)

मिनावी- एक एबोरीजनल ड्रीम टाइम कहानी


कुछ लोग अपने बच्चों के साथ समुद्र के किनारे एक कबीले में रहते थे, उसमे एक छोटी लड़की भी थी, जिसका नाम मिनावी था मिनावी दूसरे सभी बच्चों से थोड़ी अलग थी । उसे अक्सर दूसरे बच्चों के बीच झगड़ा कराने में बहुत मज़ा आता था और इस वजह से पूरी टोली परेशान हो जाती थी। लगभग रोज़ कबीले में लड़ाई हो जाती थी 

एक बार की बात है कि डूबते हुए सूरज की लाल-गुलाबी किरणें खेल के मैदान पर पड़ रही थीं, सारी लड़कियां खेल का आनंद उठा रही थीं। सारे लड़के अपने पिता के साथ, बड़े आदमियों वाले काम सीख रहे थे। माएं शाम का खाना बनाने की तैयारी कर रहीं थीं। कोयले की आग पर एक ताज़ा मछली, ताज़े केकड़े और मसेल के साथ पक रही थी। टोली के सभी लोग खुश थे। फसल उनके लिए अच्छी रही थी। खूब ताज़ा खाना उपलब्ध था। मिनावी के अलावा सब खुश थे।मिनावी सबसे अलग थी। बचपन से ही, मिनावी को दूसरी लड़कियों को परेशान करना अच्छा लगता था। मिनावी का चेहरा इतना बदसूरत और कठोर था, कि उसे देखकर उसके मन की नफरत का अंदाजा लगाया जा सकता था। बुजुर्गों को पता था कि मिनावी सबको परेशान करने की कोशिश करती है, जिससे झगड़ा होता है, केवल छोटी लड़कियों में, बल्कि उनकी माँओं में भी। बुजुर्गों ने मिनावी की माँ को चेतावनी दी कि अगर उन्होंने मिनावी को गड़बड़ करने से नहीं रोका, तो उसके साथ कुछ भयानक घट जाएगा, पर मिनावी ने इस पर ध्यान नहीं दिया

साल बीतते गए, और मिनावी जवान हो गयी। पर उसे तब भी झगड़ा कराना अच्छा लगता था। एक दिन सारी जवान लड़कियों को, मिनावी को भी, दुल्हन बनने के लिए तैयार होना था। मिनावी भी अन्य लड़कियों के साथ खड़ी हो गई।
बुजुर्गों ने बताया कि कौन सा लड़का किससे शादी करेगा। समारोह के आखिर में, मिनावी अकेली खड़ी रह गई। किसी भी लड़के ने उसे शादी के लिए नहीं चुना मिनावी के मन में नफरत और ज़्यादा बढ़ गयी। उसने टोली में और भी ज़्यादा गड़बड़ करनी शुरू कर दी। कबीले में रोज़ ही लड़ाइयाँ होने लगीं। मिनावी अपनी छोटी सी झोपड़ी में बैठी रहती और देखा करती, आप ही खुश होती रहती। बुजुर्गों ने तय किया कि मिनावी को अपने किये की सज़ा मिलनी चाहिए। मिनावी को कबीले के निर्णय के बारे में थोडा बहुत पता था। जब वह औरतों के बीच एक और झगड़ा कराने जा रही थी, आदमियों ने उसे पकड़ लिया और ज़मीन में गिरा दिया उसे चारों ओर गोल-गोल घुमाया वह किसी तरह भाग निकली और समुद्र के किनारे पहुँच गई जहां उसने बुरी आत्माओं से प्रार्थना की कि वे उसे एक क्रूर जानवर में बदल दें, जिससे वह अपने कबीले से बदला ले सके। मिनावी एक बड़े मगरमच्छ में बदल गई और चुपचाप कीचड़ में घुस गई, अपने शिकार का इंतज़ार करने लगी कबीले के लोग धीरे-धीरे मिनावी को भूल गए और अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गए।
एक दिन जब वे केकड़ों को ढूंढ़ने समुद्र के किनारे आए, मिनावी इन्जार में लेटी थी। एक आदमी जो मिनावी को सज़ा दिलाने में शामिल था, जब पानी में कूदा, तो मिनावी पीछे से रेंग कर गई और उसे दबोच लिया। उसने आदमी से कहा कि वह उसे चारों ओर गोल-गोल घुमाएगी, उसने तब तक बार-बार, आदमी को पानी में घुमाया, जब तक उसे संतोष नहीं हो गया कि उसे काफी सज़ा मिल चुकी है तब से आज तक, मिनावी की आत्मा मगरमच्छ में समाई हुई है, और इसीलिये हर बार जब मगरमच्छ अपने शिकार को पकड़ता है तो हमेशा पानी में चारों तरफ गोल-गोल घुमाता है।

एनीमेशन फिल्म का अनुवाद- रेखा राजवंशी 

Sunday, January 16, 2011

ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी Aboriginals/Indigenous Australians/original habitants of Australia


ऑस्ट्रलिया के मूल आदिवासी



ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी यहाँ पर रहने वाले 'एबोरीजनीज़' यानी आदिवासी हैं जो अंग्रेजों के पहुँचने से पहले यहाँ पर बसे हुए थे । इतिहासविदों के अनुसार ऑस्ट्रेलिया में चालीस या पचास हज़ार साल पूर्व पहली बार मनुष्य के पहुंचने के प्रमाण मिलते हैं । परन्तु ये अनुमान लगाया जाता है कि 125 ,000 वर्षों के अन्दर ही  किसी समय मनुष्य यहाँ पहुंचा और बस गया ।  जो प्राचीनतम अवशेष प्राप्त हुए हैं उनसे पता लगता है कि 40 ,000 साल पहले मानव यहाँ रहता था और कहा जाता है कि इनके वंशज एक बार में ही ऑस्ट्रेलिया आकर बस गए परन्तु कुछ लोगों का ये भी मानना है कि तीन अलग-अलग समय पर वे यहाँ पहुंचे । प्रारम्भ में ये लोग शिकार करके गुज़ारा करते थे, भोजन और पानी की तलाश में वे जगह बदल लेते थे, कई बार खराब मौसम भी उन्हें नई जगह ढूँढने के लिए बाध्य कर देता था पर वे पूरी तरह बंजारे नहीं थे, उन्हें अर्द्ध खानाबदोश कहा जा सकता है । ज़्यादातर आदिवासी देश के दक्षिणी और पूर्वी क्षेत्र में रहते थे । जब अंग्रेजों का पहला जहाज़ी बेड़ा 1788 में पहली बार ऑस्ट्रेलिया आया तो उनकी कुल संख्या करीब 750 ,000 थी । इन आदिवासियों की कई जातियां थीं, जो अपने दल में रहती थीं और उनकी भाषा भी अलग-अलग थीं। उस समय इन बोलियों की संख्या करीब तीन सौ थी पर अब इनमें से करीब दो सौ भाषाएँ या तो समाप्त हो चुकी हैं या समाप्त प्रायः हैं ।





आज इनकी संख्या ऑस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या का 2 .7 भाग है  । इन मूल निवासियों को दो श्रेणियों में रखा जाता है 'एबोरीजनीज़' और 'टॉरेस स्ट्रेट आइलैंडर', एबोरीजनीज़ ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों, तस्मानिया और आस-पास के द्वीपों में रहते हैं और टॉरेस स्ट्रेट आइलैंडर्स टॉरेस स्ट्रेट आइलैंड्स में रहते हैं, जो क्वींसलैंड के उत्तरी भाग में स्थित हैं और पपुआ न्यू गिनी के पास हैं,  । इन आदिवासियों की भाषा, संस्कृति, मूल्य, परम्पराएं और विश्वास अलग-अलग हैं । आज के अधिकतर एबोरीजनल लोग अंग्रेज़ी भाषा का उपयोग करते हैं । इन एबोरीजनल्स का  कला और संगीत से गहरा रिश्ता था, अपनी सभ्यता और मूल्य अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए वे कहानियों का उपयोग करते थे । इन कहानियों को 'ड्रीम टाइम स्टोरीज़' यानि स्वप्न कालिक कहानियां कहते हैं, इनके माध्यम से अपने नियम और परम्पराएं वे अपने बच्चों को सिखाते थे, उनकी कुछ रीतियाँ थीं जिनका पालन करना समूह के सदस्यों के लिए ज़रूरी था, नहीं तो दंड देने का विधान था । बच्चे बुजुर्गों की बहुत इज्ज़त करते थे । डिजरी डू नाम का संगीत वाद्य इनका प्रिय वाद्य है जिसे आज भी हर उत्सव में बजाया जाता है । पत्थरों और चट्टानों पर इनके द्वारा बनाए हुए चित्र भी इनकी कलात्मकता का परिचय देते हैं, अपने शरीर पर भी वे विभन्न आकारों में चित्रकारी करते हैं । बूमरैंग इनके द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक ऐसा शस्त्र है जिसकी विशेषता है कि फेंके जाने पर शिकार करके शिकारी के  पास ही  वापिस लौट आता है । इनके भोजन में कंगारू का मांस लोकप्रिय है, हालांकि अन्य जानवरों का मांस भी ये शौक से खाते हैं, इसके अलावा मछली, मेवे, झाड़ियों में उगने वाले फल इनके भोजन का भाग हैं । अंग्रेजों के आने पर इन्हें उनके अत्याचारों का शिकार होना पड़ा और इनकी संख्या भी कम हो गई, पर आज ऑस्ट्रेलिया में इनकी अलग पहचान है और सरकार इन्हें ऑस्ट्रेलिया के मूल वंशज के रूप में मान्यता देती है ।

Saturday, January 15, 2011

क्वींसलैंड में बाढ़ Floods in Queensland

ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड प्रान्त में बाढ़ का प्रकोप 

बाढ़ ने 11 -13 जनवरी  2011 के दौरान क्वींसलैंड के दक्षिणी-पूर्वी क्षेत्र में भारी तबाही मचाई । बाढ़ ने ब्रिसबेन नदी को प्रभावित किया और पानी तट की सीमा लांघता हुआ शहर में आ पहुंचा बाढ़ का प्रकोप इतना ज्यादा था कि मनुष्य तो क्या, अनेक कारें और अन्य बड़े वाहन भी इसमें बह गए । नए समाचारों के अनुसार इस बाढ़ में मरने वालों की संख्या आज तक 17 बताई गई है और 14 लोग अब भी लापता हैं, हालांकि कल तक लापता लोगों की संख्या 20 बताई गई
थी टावूम्बा, लेक आयर वैली व अन्य क्षेत्रों में अभी भी खोज जारी है बताया जाता है कि पिछले सौ सालों में यह सबसे अधिक भयानक बाढ़ है।
अब ब्रिसबेन के सुरक्षित इलाकों में लोग अपने घर वापिस लौटने लगे हैंपर एक असामान्य और संघर्षपूर्ण जीवन उनके सामने है अधिकतर लोग अपना सब कुछ गँवा बैठे हैं और अब कहा जा रहा है कि उनकी समस्त हानि की भरपाई इनश्योरेंस द्वारा नहीं हो सकती क्योंकि इस पालिसी के अंतर्गत उनका सामान मड यानी कीचड़ से होने वाले नुकसान के लिए बीमाकृत नहीं है । मात्र ब्रिसबेन में ही छब्बीस हज़ार घरों में नुकसान हुआ है, जिसमें से 12 ,000 घर पूरी तरह पानी में समा चुके हैं   ऐसे समय में सारा देश एक साथ है और प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड ने वहां जाकर स्थिति का जायज़ा किया और लोगों को सांत्वना दी । क्वींसलैंड की प्रीमियर सुश्री ब्लाई ने कहा कि वहां जो कुछ उन्होंने देखा वो लड़ाई के मैदान की तरह था सब कुछ अस्त-व्यस्त था ।
जहां एक ओर  अपने प्रियजनों को बाढ़ में बहते देख न बचा पाने की मजबूरी को लेकर लोग सदमें में हैं, वहीं दूसरी ओर सहायता सेवा और वोलनटियर्स का उत्साह देखते बनता है । वे खाने पीने की परवाह किये बिना लोगों की सहायता में व्यस्त है, सेना के जवान भी बाढ़ग्रस्त इलाके में मदद कर रहे हैं
क्वींसलैंड के आस-पास रहने वाले करीब 86 समुदाय के लोग इस बाढ़ से प्रभावित हुए हैं और इस नुकसान की कीमत अरबों डालरों में आंकी जा रही है, परन्तु अच्छी बात ये है कि राहत के लिए ऑस्ट्रेलियावासी खुले हाथ से दान दे रहे है. ऑस्ट्रेलिया के दो मुख्य स्टोर्स वूल्वर्थ्स और कोल्स ने ही करीब चार बिलियन अनुदान इकट्ठा किया है । अब तक
20 ,000 लोग वोलनटियर्स  की सूची में अपना नाम लिखा चुके हैं और देश के अन्य राज्यों से भी वोलनटियर्स पहुँच कर मदद देने को तैयार हैं वे एक-एक करके घरों की सफाई में लगे हैं और एक-दूसरे की सहायता कर रहे हैं, परन्तु दस लोग घरों में लूट-पाट के लिए भी गिरफ्तार किये गए हैं   आशा की जा रही है कि जल्दी ही जीवन सामान्य हो जाएगा हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि अभी तो बारिश की शुरूआत हुई है और क्वींसलैंड के निवासियों को आगे भी तैयार रहने की ज़रुरत है

रेखा राजवंशी
updated on 16/1/2011

Friday, January 14, 2011

सिडनी में अशोक चक्रधर जी Ashok Chakradhar in Sydney

लोकप्रिय कवि अशोक चक्रधर जी से सिडनी में एक मुलाक़ात 



पांच माह पहले अशोक जी और बागेश्री जी अपने बेटे अनुराग के पास सिडनी आए, चूँकि वे दिल्ली में मेरे पड़ोसी थे और उनकी कविताओं की मैं प्रशंसक भी हूँ , और बागेश्री जी का गाना भी मुझे पसंद था, तो उनसे अनुराग के घर में मुलाक़ात हुई और बातचीत का सिलसिला चल निकला। वे मात्र एक कवि ही नहीं हैं, बल्कि एक विचारक और दार्शनिक भी हैं । जब भी वे ऑस्ट्रेलिया आते हैं तो हिन्दी प्रेमी उन्हें घेर ही लेते हैं और वे भी कम्प्यूटर ज्ञान, हिन्दी सोफ्टवेयर सबको बड़े प्रेम से बांटते हैं । दुनिया को देखने का उनका अलग और व्यापक दृष्टिकोण है । तो आइये उनसे की गई बातचीत का एक अंश पढ़ें-

प्रश्न: अशोक जी
आपने ऑस्ट्रेलिया में कोई कविता या ग़ज़ल लिखी?
      कभी-कभी यहाँ सपने में ग़ज़ल होती है। जब एक दो शेर हो जाते हैं तो याद आता है कि ये तो सपना है और सुबह तक भूल न जाऊं यह सोचकर कागज़, कलम उठा लेता हूँ, जब ग़ज़ल पूरी हो जाती है तो खुश होता हूँ, बिस्तर से उठकर डैक्सटर के पास जाता हूँ और उसे सुनाता हूँ ।

प्रश्न: ये डैक्सटर कौन है?
    डैक्सटर अनुराग की मित्र सबरीना का प्यारा सा पूडुल कुत्ता है ।

प्रश्न: आपकी कवि कल्पना की बात ही अलग है, तो आगे बताइये ।
    दिन में जब हम सपनीले होते हैं तो भावनाओं से गीले होते हैं और दिमाग की सवारी पर शब्दों के पीछे सरपट दौड़ लगाने लगते हैं । आखेट करते हैं शब्दों का, लेकिन रचना तब दमदार बनती है, जब शब्द आपके पीछे भागें ।

प्रश्न: ऑस्ट्रेलिया में आपका अनुभव क्या रहा?

    यहाँ लोगों के व्यवहार में खुलापन है । जब पार्क में सुबह डैक्सटर को घुमाने ले जाता हूँ तो सारे कुत्ते एक दूसरे के साथ खेलते हैं,  एक दूसरे को देख कर खुश होते है। इसी तरह यहाँ अजनबियों से भी मुस्कान का आदान-प्रदान होता है, लोग मित्रवत हैं, यह एक ऐसी संस्कृति है जो पूरी धरा पर होनी चाहिए ।

प्रश्न: तो आपका ऑस्ट्रेलिया प्रवास अच्छा रहा?
   मेरा बेटा अनुराग यहाँ है और इस वजह से सिडनी आना-जाना लगा ही रहता है अब तो ऑस्ट्रेलिया भी अपना ही लगता है ।

अशोक जी से मुलाक़ात अच्छी रही, बागेश्री जी के हाथों की चाय भी मिली। लगा कि मायके से कोई आया है, अपने देश की यादें लेकर, अपनी मिट्टी की सुगंध समेटे ।

रेखा राजवंशी

Thursday, January 13, 2011

संदूक

संदूक

मैंने फिर आज
पुरानी यादों का
संदूक खोला
गुज़रे लम्हों को तोला।


कुछ ढलके आंसू
जो अब भी नर्म थे,
भूले बिसरे अफ़साने
जो अब तक गर्म थे।

कुछ मोती, कुछ पत्थर
जो मैंने बटोरे थे,
बचपन की यादों के
रेशमी डोरे थे।

कागज के टुकड़े थे
अनलिखी कहानी थी।
हो गई फिर ताज़ी
पीर जो पुरानी थी।

बंद संदूक में
ख्वाहिश की कतरन थी।
तबले  की थापें थीं
टुकड़े थे, परन थीं।

देखा, सराहा
कुछ आंसू बहाए।
बंद संदूक में
फिर सब छिपाए।


-रेखा राजवंशी
सिडनी, ऑस्ट्रेलिया

Learn Hindi

1. A door into Hindi by Taj Afroz:   http://taj.chass.ncsu.edu/

2. The Australian National University Hindi online material:
http://www.anu.edu.au/asianstudies/hindi/swah1002/resources.html

3. To buy Hindi resources  http://quick-n-ez.com/

4. http://www.youtube.com/profile?user=tutonline#grid/uploads

5. http://www.hindisociety.com/ArticleHindiHistory.htm

7. Colorado State University Hindi Page 
 http://www.cs.colostate.edu/~malaiya/hindilinks.html


For Hindi news http://www.bbc.co.uk/hindi   

For typing in Hindi use googletransliteration http://www.google.com/transliterate/

For English into Hindi Dictionary go to http://www.shabdkosh.com/

‘ऑस्ट्रेलिया डे’ Australia Day

एक महत्त्वपूर्ण दिन ऑस्ट्रेलिया डे

छब्बीस जनवरी को जहां भारत में रिपब्लिक डे गणतंत्र दिवस की धूमधाम रहती है और महीनों पहले से ही तैयारियां शुरू हो जाती हैं, उसी तरह ऑस्ट्रेलिया में भी छब्बीस जनवरी एक महत्वपूर्ण दिन है, और बहुत दिन पहले से ही यहाँ भी सरकार ऑस्ट्रेलिया डे मनाने की योजना बनाने लगती है। छब्बीस जनवरी ऑस्ट्रेलिया के सभी राज्यों में धूमधाम से मनाई जाती है और इस दिन सार्वजनिक अवकाश होता है।

ऑस्ट्रेलिया डे इसलिए मनाया जाता है क्योंकि इस दिन 1788 में फर्स्ट फ्लीट यानी पहला जहाज़ी बेड़ा सिडनी कोव पहुंचा था और इस नयी भूमि पर ब्रिटिश झंडा फहरा कर ब्रिटिश राज्य का आधिपत्य होने की घोषणा कर दी गई थी। तब इसे नाम दिया गया था न्यू होलैंड। इस पहले जहाज़ी बेड़े में कुल मिलाकर ग्यारह जहाज़ थे और ये जहाज़ ब्रिटेन के अपराधियों से भरे हुए थे। ये जहाज़ ब्रिटेन से 13 मई 1787 को रवाना हुए, इनमें 1487 यात्री थे, जिनमें से 778 अपराधी थे। इस फ्लीट के कप्तान आर्थर फिलिप थे। ब्रिटेन की योजना इस भूमि को बसाने की तो थी ही और साथ ही साथ ब्रिटेन की पहले से ही भरी हुई जेलों से अपराधियों को दूर भेजने की भी थी। इस यात्रा के दौरान सात बच्चों ने जन्म लिया, कुछ लोग बीमार होकर मर गए। इस कठिन यात्रा में जहाज़ों को रोककर ताज़ा पानी और भोजन लिया गया। यात्रा के बीच रिओ डि जिनारियो में रुकने के बाद फ्लीट का आख़िरी पड़ाव 13 अक्टूबर को दक्षिण अफ्रीका का केप टाउन था और वहां से खाने के अतिरिक्त पौधे और जानवर भी लिए गए जिसमें गाय, बैल, सूअर, बकरी और भेड़ थे। अब सामने था अगाध समुद्र का विस्तार और कठिन यात्रा, जो जनवरी में ऑस्ट्रेलिया पहुँच कर समाप्त हुई। यह समुद्री यात्रा कुल मिलाकर 252 दिनों तक चली और इसे अपने समय की एक ऐतिहासिक यात्रा के रूप में माना जाता है।
ये सभी जहाज़ 18 -20 जनवरी के बीच न्यू साउथ वेल्ज़ में बोटनी बे पहुंचे परन्तु वहां तेज़ हवाओं, ताज़े पानी की कमी और अच्छी मिट्टी के अभाव में वहां से निकल जाना पड़ा। हालांकि वहीं पर पहली बार ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों से आमना -सामना भी हुआ। इक्कीस जनवरी को नाव में बैठकर कप्तान फिलिप दूसरी जगह ढूँढने निकला, पोर्ट जैकसन उसे ठीक लगा और अंततः छब्बीस जनवरी 1788 को जहाज़ों ने वहाँ लंगर डाल दिया। कप्तान फिलिप ने इसे नया नाम दिया 'सिडनी कोव' और ब्रिटेन का झंडा फहरा कर औपचारिक रूप से उसे ब्रिटेन की बस्ती के रूप में घोषित कर दिया। तब से लेकर आज तक ऑस्ट्रेलिया वासी इस नए राष्ट्र के उदय की खुशी में ऑस्ट्रेलिया डे मनाते हैं।

जहां एक ओर ऑस्ट्रेलिया डे का उत्सव मनाया जाता है, वहीं दूसरी ओर ऑस्ट्रलिया के मूल निवासी आदिवासी एबोरीजल्स इसे एक दूसरे रूप में मनाते हैं। यूरोपीय लोगों के आने के इस दिन को वे मूल आदिवासी संस्कृति और प्रकृति के विनाश के रूप में मनाते हैं और 1938 में इसे शोक दिवस यानि डे ऑफ़ मौर्निंग कहकर पुकारा गया परन्तु लोगों के आपत्ति करने के कारण इसे बाद में आक्रमण दिवस 'इन्वेज़न डे' या सर्वाइवल डे के नाम से पुकारा गया। हालांकि अब एबोरीजल्स स्वयं को ऑस्ट्रेलिया का ही एक हिस्सा मानते हैं और ऑस्ट्रलियन सरकार ने उनके हित में विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं, परन्तु इतिहास को याद रखने का ये उनका एक प्रयास है

ऑस्ट्रेलिया डे पर देश के हर राज्य में विशेष उत्सवों का आयोजन किया जाता है, लोग सुबह से ही किसी भी सार्वजनिक स्थान पर इकट्ठे होने लगते हैं जैसे पार्क आदि में। झंडा फहराया जाता है, भाषण होता है, महत्वपूर्ण स्थानों पर परेड भी होती है, संगीत का आयोजन होता है, सरकार की तरफ से फ्री बार -बी-क्यू नाश्ता भी होता है, जिसमें लोग ब्रेड रोल सौसेज के साथ खाते हैं, बच्चों के लिए  क्रिया-कलाप आयोजित किये जाते हैं, गैस भरे गुब्बारों की टोकरी में बैठकर बच्चे बहुत खुश होते हैं, नौका दौड़ होती है और पूरे दिन उत्सव का माहौल बना रहता है। रात को आतिशबाजी भी होती है। नए नागरिकों को शपथ दिलाई जाती है और नागरिकता प्रमाण पत्र दिए जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा में ऑस्ट्रेलिया डे के अवार्ड्स दिए जाते हैं, और पूरा दिन हँसते--हंसाते बीत जाता है। आजकल कुछ भारतीय मूल की संस्थाएं ऑस्ट्रेलिया और रिपब्लिक डे एक साथ मनाती हैं, भारतीय नाच गाने, भाषण के अलावा भारतीय मूल के विद्यार्थियों को हाई स्कूल में उच्च अंकों के लिए उपहार व सम्मान भी दिया जाता है।