Thursday, January 13, 2011

ऑस्ट्रेलिया की रंगभेद नीति

ऑस्ट्रलिया में रंगभेद का कारण श्वेत ऑस्ट्रेलिया नीति

ऑस्ट्रेलिया पिछले दो वर्षों से विवाद के दायरे में घिरा रहा है। भारतीय छात्रो की मार पिटाई और उनके साथ हुई हिंसात्मक घटनाओं के कारण भारतीय ऑस्ट्रेलिया के प्रति अपने मन में नफरत पाल बैठे हैं। तो क्या वाकई में ऑस्ट्रेलिया में प्रजातिवाद है? हालांकि किसी भी तरह के विभेदीकरण को लेकर कड़े नियम बने हुए हैं जैसे 'एंटी डिसक्रिमिनेशन एक्ट' आदि।
ऑस्ट्रेलिया में तीस साल पहले आए हुए भारतीयों का मानना है कि अब स्थिति सुधरी है, परन्तु अपराध बढ़ा है और अपराध के चलते ही भारतीय छात्रों के साथ इस तरह की घटनाएँ हुई है। कुछ लोग ये भी मानते हैं कि ये प्रजातिवाद या रंग विभेद खुले रूप में तो नहीं है पर जब नौकरी में ऊंचे ओहदे पर प्रमोशन की बात होती है तो श्वेत लोगों को ही प्राथमिकता दी जाती है। तो आइये देखें कि ऑस्ट्रेलिया में इस रंगभेद नीति और प्रजातिवाद की जड़ कहाँ है?
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व्हाईट ऑस्ट्रेलिया पोलिसी' यानी 'श्वेत ऑस्ट्रेलिया नीति' की जड़ें 1901 तक जाती हैं, जब ऑस्ट्रलिया एक फेडरेशन बना तो कुछ ऐसी नीतियां बनाई गई जिसके तहत नॉन-व्हाईट यानि अश्वेत लोगों को ऑस्ट्रेलिया में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई और यह नीति 1901 से लेकर 1973 तक लागू रही । यह एक ऐसी नीति थी जिससे दुनिया भर में ऑस्ट्रेलिया के प्रति रोष पैदा हो गया और साथ ही ऑस्ट्रेलिया पर एक 'रेसिस्ट' देश का ठप्पा लग गया।
जब हम ऑस्ट्रेलिया के इतिहास पर नज़र डालें तो पता लगेगा कि इस अश्वेत नीति के कई कारण थे। पहला कारण था ऑस्ट्रेलिया में सोना पाया जाना, 1851 में जब पहली बार न्यू साउथ वेल्ज़ में सोना पाया गया और इसके छः महीने बाद विक्टोरिया में और बाद में अन्य स्थानों में भी स्वर्ण पाए जाने की खबर जब आग की तरह फ़ैली तब दुनिया भर के लोग ऑस्ट्रेलिया आ गए। इनमें मुख्य थे चीन से आए लोग और बाद में दक्षिण समुद्री द्वीपों से आये लोग। दूसरा कारण था कि मजदूरों में आपसी मतभेद हो गया, क्योंकि दूसरे देशों से आए मजदूरों ने कम वेतन लेकर लम्बे समय तक कम करना शुरू कर दिया और तीसरा प्रमुख कारण था कि कुछ राष्ट्रवादी लोगों ने उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में प्रजातिवाद का वातावरण पैदा कर दिया था, जिसके कारण 1901 में एक कानून 'इमिग्रेशन रेसट्रिकशन एक्ट' पास हुआ जिसका मकसद अप्रवासन पर कुछ प्रतिबन्ध लगाना था जिससे ऐसे लोगों के आने पर रोक लगाई जा सके जो असामान्य नज़र आते थे या जो किसी संक्रामक बीमारी से ग्रसित थे या जो सरकार पर एक बोझ बन सकते थे या जिनका चरित्र संदिग्ध था। इस एक्ट में वेश्याओं, अपराधियों और मजदूरों के आने पर भी प्रतिबन्ध लगाए गए। उनके अप्रवासन को रोकने के लिए एक ऐसा डिक्टेशन टेस्ट यानि अनुवाद की परीक्षा उन्हें दी जाने लगी जो बहुत कठिन थी और अप्रवासन के इच्छुक लोगो को ये टेस्ट ऐसी भाषा में दिए जाते थे जो उन्हें ज्ञात ही नहीं थी। इन लिखित परीक्षणों का एकमात्र प्रयोजन था अश्वेत, अवांछित लोगों को ऑस्ट्रेलिया में प्रवेश की अनुमति देना। इन सख्त मापदंडों का उस वक्त ऑस्ट्रेलिया वासियों ने स्वागत किया और इसकी भरपूर सराहना भी की। यहाँ तक कि 1919 में ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री विलियम मौरिस ह्युघ्स ने कहा  ये हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है

बाद में ऑस्ट्रेलिया की इस नीति का समापन होने में 25 साल लग गए और इसका समापन की शुरूआत तब हुई जब १९४९ में लिबरल और कंट्री दलों का मेल हुआ और तत्कालीन इमिग्रेशन मंत्री हैरोल्ड होल्ट ने पहली बार आठ सौ अश्वेत लोगों को ऑस्ट्रेलिया में ही रहने की आज्ञा दी और जापान युद्ध की विधवा स्त्रियों को वापिस आने की अनुमति दी। इसके बाद के सालों में धीरे-धीरे ऑस्ट्रलिया में इस श्वेत नीति में सकारात्मक बदलाव किये गए और अंततः 1973 में जब नई लेबर सरकार बनी तो इस नीति को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।

Wednesday, January 12, 2011

जैसे हर बात पे - ग़ज़ल

 दीप रातों में

दीप रातों में जला के रखिये
फूल कांटों में खिलाके रखिये ।

जाने कब घेर ले अकेलापन
एक-दो दोस्त बनाके रखिये ।

दर्द के, दुःख के विरह के आंसू
मुस्कराहट में छिपाके रखिये ।

राह लम्बी है ज़िंदगी छोटी
ख़्वाब खुशियों के सजाके रखिये ।

राज़ अपने हों या पराए हों
अपने होठों में दबाके रखिये।

दोस्त तो दोस्त दुश्मनों को भी
अपने सीने से लगाके रखिये ।

कोई हमदम न कहीं मिल जाए
चाँद तारों को सजाके रखिये ।






शहर का मौसम


आज मेरे शहर का मौसम उदास है
जैसे कि कोई दिल के कहीं आस-पास है



आहट किसी के पाँव की सुनकर लगा मुझे
चुपचाप चल रहा है, कोई मेरे साथ है



क्यों सर्द रात आज फिर देने लगी तपिश
लगता है तेरे हाथ में फिर मेरा हाथ है



आज जाने क्या हुआ कि वक्त रुक गया
काटे नहीं कटती भला ये कैसी रात है



जिसकी तलाश करती हूँ, तेरी निगाह में
लगता है उस सवाल का ये ही जवाब है



जैसे हर बात पे



जैसे हर बात पे डर लगता है
कितना मुश्किल ये सफ़र लगता है ।

लोग रोने पे सज़ा देते हैं
मुस्कराना तो ज़हर लगता है ।

राह के दीप बुझ गए सारे
कैसा वीराना शहर लगता है ।

लाके साहिल पे डुबो देता है
ये सफ़र मौत का घर लगता है ।

उसकी सूरत का क्या करें दीदार
जब ये पर्दा ही कहर लगता है 





कंगारूओं के देश से


काश

काश मेरा आकाश
कुछ और फ़ैल जाता
काश मेरी हवा
कुछ और दूर जाती
और छूकर आती
उन लोगों को
जो वर्षा में
बाढ़ से पीड़ित हैं
जो गर्मी में
सूखे से ग्रसित हैं
जो भीख मांगने को
लाचार हैं
हाथ पैर होते हुए
बेकार हैं


काश मेरा आकाश
कुछ और फ़ैल जाता
काश मेरी हवा
कुछ और दूर जाती
और छूकर आती उन्हें
जो व्यवस्था के
शिकार हैं
उन छोटे बच्चों को
जो बीमार हैं
उन महिलाओं को
जो सहती तिरस्कार हैं
उन बच्चियों को
जो झेलती बलात्कार हैं ।

काश मेरा आकाश
कुछ और फ़ैल जाता
काश मेरी हवा
कुछ और दूर जाती
दुखी लोगों के
मन को सहलाती
बूढ़े पिता को
धीरज बंधाती
अकेली माता को
हिम्मत दिलाती
नन्हीं मुनिया को
प्यार से बहलाती

काश मेरी दुआ
दूर मेरे लोगों तक जाती
और उन्हें छूकर आती
कंगारूओं के देश से





बदलाव

पिंजरे के तोते
बजी बन गए
बांसुरी के सुर सज गए
डिजरी डू में
गुलमोहर सिमट गए
बोटल- ब्रश की झाड़ियों में
और जाने कब
कैद हो गए
दीवाली और ईद
सप्ताहांत में

जाने कैसे बदल गई
वक्त की परिभाषा
घड़ी की सुई से बंध गई
रिश्तों की आशा

दोस्त बदलाव की
इस प्रक्रिया में
सवाल नहीं है
कुछ पाने या खोने का
खुश होने या न होने का

सवाल बदलाव को
स्वीकारने का है
सवाल हालात से
न हारने का है



 


बदलते बच्चे

आकाश के बादल
विविध आकार लेते हैं
रात के तारे
अनगिन रूप बदलते हैं
शाम के झुटपुटे में
चन्दा मामा भी आता है
साथ में चरखा कातती
बुढ़िया दादी भी लाता है
जुगनू अँधेरे में थाम लालटेन
जाने किसे ढूँढने आता है
पर उसे देख कोई बच्चा
ताली नहीं बजाता है

जाने किसकी प्रतीक्षा में
रात-रानी सुगंध फैलाती है
जाने किसे रिझाने को
कोयल गीत गाती है
और किसी को न पाकर
उदास हो जाती है

कमरे के अन्दर कोने में
टेबल लैम्प जलते रहते हैं
और आजकल के बच्चे
अपने जीवन में उलझे रहते हैं
चलता रहता है घर में
टी वी, वीडियो गेम या कम्प्यूटर
होता रहता है होमवर्क
बैठा रहता है ट्यूटर
इन्द्रधनुष के रंग
देखते नहीं. बाहर जाकर
बच्चे वाकई बदल गए हैं
इक्कीसवीं सदी में आकर


भटकाव 
 इंसान ने काट दिए
जंगलके जंगल
उखाड़ दिए फलते-फूलते दरख़्त
उजाड़ दिए खुशबू लुटाते गुलिस्तान
बो दिए घ्रणा के बबूल
और हरी-भरी धरती को देखते ही देखते
बना दिया रेगिस्तान ।



उसने बनाईं बड़ी-बड़ी इमारतें
पूरी कीं जाने
क्या-क्या हसरतें
चाँद को छुआ
आसमान में उड़ा
अणुबम बनाया
और अपनी ही कौम पर उसे चलाया
इंसान ने खुद को मिटाया
पैसे को बड़ा बनाया
बंधा रहा हर वक्त
लालच के पाश से
और बिता  दी पूरी ज़िंदगी 
शान्ति की तलाश में ।

कि ग्लेशियर बदलते रहे
मौसम बे-मौसम बदलते रहे
तपती रही धरती,
विनाशकारी नर्तन
करने लगी प्रकृति ।

बंजर मन और सूनी आँखें
लगाती रहीं जाने क्या आशा
और बदलता रहा मानव
भूलता रहा
प्रेम की भाषा ।

राष्ट्र भाषा हिंदी

हिन्दी हमारी राष्ट्रीय भाषा

इस वर्ष ऑस्ट्रेलिया में हिंदी दिवस पर हमारी राष्ट्र भाषा हिंदी की धूमधाम रही। ऑस्ट्रेलिया के विभिन्न शहरों में तरह--तरह के उत्सवों का आयोजन किया गया, जिसमें हिन्दी प्रेमियों ने उत्साह पूर्वक भाग लिया। हिन्दी आज विश्व की सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषाओं में दूसरे स्थान पर है, विश्व में करीब 600 मिलियन लोग हिंदी भाषी हैं। पिछली जनगणना के अनुसार ऑस्ट्रेलिया में करीब चालीस हज़ार व्यक्तियों की प्रथम भाषा हिन्दी है। हिन्दी के इतिहास पर नज़र डालें तो हिंदी का प्रादुर्भाव संस्कृत भाषा से हुआ व इसे सिन्धु कहा गया और फारसी भाषा में '' का उच्चारण न होने के कारण उन्होंने इसे सिंध से हिंद व फिर हिन्दी बना दिया। पिछले कुछ दशकों में हिंदी की स्थिति में बहुत परिवर्तन आया है, हिन्दी ने अपना रूप बदला है और अनेकों भाषाओं के शब्दों ने इसे और अधिक समृद्ध बनाया है। हिन्दी एक व्यवस्थित भाषा है और इसके नियम लगभग निश्चित है। इसके शब्द भंडार में हिन्दी के मूल शब्दों की संख्या ढाई लाख से भी अधिक है। हिन्दी भाषा हमारे देश की संस्कृति और संस्कारों का प्रतिबिंब है और इसे अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी बहुत पसंद किया जाता है और आज विदेशों में भी विश्व हिन्दी सम्मेलनों का सफल आयोजन होता है। फीजी, मॉरिशस, गयाना, सूरीनाम और नेपाल में अनेक लोग हिन्दी भाषी हैं।
भारत सरकार द्वारा हिंदी भाषा को एकजुटता का माध्यम बनाने के लिए सन् 1949 में एक एक्ट बनाया गया जिसका उद्देश्य सरकारी कार्यों में हिंदी का प्रयोग अनिवार्य करना था। आज हिन्दी देश की राजभाषा है, भारत में तकनीकी क्रांति ने इसे इन्टरनेट के माध्यम से विश्व के  कोने-कोने में पहुंचा दिया है।
आज हिन्दी की शिक्षा ऑस्ट्रलिया में दो यूनिट के रूप में हाई-स्कूल के विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध है, कुछ वर्ष पहले हिन्दी सिडनी विश्वविद्यालय में भी थी परन्तु अब वह प्रौढ़ शिक्षा का एक भाग बन कर रह गई है, यहाँ विभिन्न स्तरों पर हिन्दी सिखाई जाती है। कैनबरा और मेलबर्न में हिन्दी विश्वविद्यालय में पत्राचार या डिस्टन्स से सीखी जा सकती है।
 
- रेखा राजवंशी

ग़ज़ल

ग़ज़ल
भूल जाने की बात करते हो
दिल लगाने की बात करते हो

पोंछ भी न सके मेरे आंसू
मुस्कुराने की बात करते हो

हम तो यूँ रात भर नहीं सोए
जाग जाने की बात करते हो

देख मुझको संभल न पाए तुम
दूर जाने की बात करते हो

राज़े दिल अब सभी पे ज़ाहिर है
तुम छिपाने की बात करते हो

वो ज़माना कभी गया ही नहीं
जिस ज़माने को याद करते हो

ज़िंदगी
 
ज़िंदगी धुंध है, कुंहासा है
मन समंदर है, फिर भी प्यासा है

ढूंढ़ते हम किसी को भीड़ में भी
सब है यह तो महज़ दिलासा है

सुबह है कह रहे हैं सारे लोग
क्यों फिर माहौल रात का सा है

रौशनी तो शहर में काफी है
बस मेरा घर ज़रा बुझा सा है


अपना वतन
छोड़कर अपना वतन हम आ गए ऑस्ट्रेलिया,
याद के दिए जला, हर रात भारत को जिया
आँख से आंसू गिरे जब हार के या जीत के,
फोन का चोगा उठाया और मां से कह दिया
निकल आये जब खजाने गाँव के संदूक से,
चाँद का तकिया लगा फिर याद बचपन को किया

हर तरह की बोतलें लाकर सजाईं बार में,
पर हुई पूजा तो गंगाजल ही हाथों में लिया
मंदिरों और मस्जिदों के फासले मिटने लगे,
जो मिला अपने वतन का साथ उसको ले लिया
मुश्किलें जब देश पर आई तो मन व्याकुल हुआ,
खैरियत से सब रहें रब से यही माँगी दुआ




कुछ गीत







बेटी


बेटी तो रौनक है घर की,
खुशियाँ लाती दुनिया भर की।

बेटी बिंदी की लाली है
सूर्य किरण प्रातः वाली है।

बेटी है नैनों का काजल
बेटी जैसे है गंगाजल।

बेटी है पायल की रुनझुन
बेटी है गीतों की गुनगुन

बेटी है तुलसी आँगन की
खन-खन जैसे है कंगन की।

बेटी है तो घर में खुशियाँ
बेटी से ही चलती दुनिया

बचपन के दिन

याद आते हैं बचपन के दिन ।
तड़पाते हैं बचपन के दिन ।

वो दिन दादा के गाँव के
वो दिन पीपल की छाँव के ।
शैतानी के साज़िश के दिन
गर्मी के दिन बारिश के दिन ।

परियों के भूतों के क़िस्से
चोरी के आमों के हिस्से ।
वो दिन नुक्कड़ के नाई के
वो दिन कल्लू हलवाई के ।
याद आते हैं……

वो दिन चूरन के इमली के
वो दिन फूलों के तितली के ।
वो दिन सावन के झूलों के
वो दिन अनजानी भूलों के ।

चंदा के दिन तारों के दिन
खेलों के गुब्बारों के दिन ।
वो दिन अलमस्त नज़ारों के
वो दिन तीजों त्यौहारों के।
याद आते हैं……

हैं याद दशहरे के मेले
वो चाट पकौड़ी के ठेले ।
वो रावण का पुतला जलना
वो राम का सीता से मिलना ।

जगमग वो दिन दीवली के
आतिशबाज़ी मतवाली के ।
वो दिन जो खील बताशों के
वो दिन जो खेल तमाशों के ।
याद आते हैं……

वो दिन गुझिया के कॉंजी के
वो दिन टेसू के झॉंझी के ।
वो दिन कट्टी के, साझी के
वो दिन ताशों की बाज़ी के ।

वो दिन होली के रंगों के
वो आपस के हुड़दंगों के ।
वो दिन मीठी ठंडाई के
नमकीन के और मिठाई के ।
याद आते हैं……

वो दिन अम्मा के खाने के
बाबू के लाड़ लड़ाने के ।
वो दिन गुड्डे के, गुड़िया के
वो दिन सपनों की दुनिया के ।
याद आते हैं



नया प्रात
 

मिट्टी के घरोंदे
बनते टूटते रहे,
सपनों की गठरी
लुटेरे लूटते रहे।

पीड़ा की टोकरी,
कंधे पर लगे बड़ी,
कुम्हलाई अभिलाषा
गर्मी में खड़ी-खड़ी

बालू से फिसल गए
कितने दिन-रात,
विकलित मन ढूंढ रहा
कोई नया प्रात|

मुक्तक muktak

प्रिय मित्रों, यह ब्लॉग २००९ में. बनाया था पर कुछ पोस्ट करने का वक्त नहीं मिल सका आशा है कि आप इन कविताओं को पढ़ेंगे और कुछ पसंद आए तो कृपया लिखें

मुक्तक

1.
दीप वो दीप है जो जल के रौशनी कर दे,
गुल वही गुल है जो गुलशन में खुशबुएँ भर दे
ज़िंदगी यूँ तो हर इंसान जिया करता है,
आदमी वो है जो मुर्दों में ज़िंदगी भर दे

2.
तेरे आने की जब कभी भी खबर आती है
रात रानी मेरे आँगन में बिखर जाती है
चाँद जब रात को फैलाता है अपना आँचल
नींद जैसे किसी बच्चे सी मुस्कुराती है
 
3.
जहां होली, दीवाली, ईद और क्रिसमस मनाते हैं,
जहां पर राम और रहमान पढ़ने साथ जाते हैं
जहां मिट्टी बनी पावन नानक, बुद्ध, गांधी से,
उसी भारत की यादों को कलेजे से लगाते हैं

4.
 वतन से दूर रहकर भी, वतन को याद करते हैं,
सजा मंदिर, खुदा से हम यही फ़रियाद करते हैं
कि मेरे देश की करना हिफाज़त राम और मौला,
कि कुछ आतंकवादी देश को बर्बाद करते हैं

5.
बना कर शून्य जिसने ज्ञान अंकों का दिया जग को
सिखाकर ध्यान और योग बनाया स्वस्थ तन मन को ।
सुना कर धर्म वेदों का, पढ़ा कर कर्म गीता का,
नमन भारत तुझे करना सिखाया प्रेम दुश्मन को ।